Words can create magic and I want to get lost in them for some part of each day.

February 10, 2011

Portrait of Gulzar


इक सोने से   दिल को
वक़्त के सांचे में खूब पकाओ

चाँदी से पिघले लफ़्ज़ों का
फ़िर महका हुआ वर्क चढ़ाओ

प्यार के मीठे बोल ,खट्टे ग़म
नीम सी यादें कुछ मिलाओ 

सुबुक अहसासों का सोता बने फ़िर -
जो कह न सके कोई, उसे पढ़ कायल हो जाओ

उस दिल से निकली हर  बात
से भर जाओ ,पर न भर पाओ.

February 7, 2011

Oooh Eggs !


Fried Eggs
Fried eggs
With lacy brown edges
Somewhat tattered -
With a Sunshine heart
That oozes with cheesy,buttery
Warmth and Goodness.
Just an Egg. 
I am just an egg
I get addled,scrambled .
You can break my heart easily
Turn me to mush.
But when the heat is on:
I  can stand it with aplomb,
Know anyone who can
be cracked , coddled, but still remains whole :
without whom you can not start the day ?

February 6, 2011

एक बात .

पुराने दरख्तों की जड़ों की तरह ,
तुम्हारा प्यार दिल में घर करता है -
यूं तो यह कोई बोलने की बात नहीं-
सिर्फ महसूसने की है -पर गर जानना चाहो तो.
बावली सरसों के पीले खेतों की तरह
अचानक कभी जब झूमता है मन, तो
गीत वही गुन-गुनाता  है जो खेत को
चूमता  हुआ  दरख़्त भी गाता है .
कई बार जो , बेबाक
उपर से दीखता नहीं, 
आसानी से उखड़ता भी नहीं.

February 1, 2011

मेरे कमरे में एक हाथी है ...

भ्रष्टाचार को जड़ से मिटा डालो
मोर्चा,धरना,रैली निकालो.
आज हम सभी ने यह ठाना है -
पर भ्रष्टाचार के घर का पता किसे बताना है ?

हम तो ईमानदार हैं
इसीलिए अपने अन्दर झाँकने से कतराते हैं
आँखों के आगे ईमानदारी का खून होता देख मुंह फ़ेर चुप रह जाते हैं .
पर भाषण ,बहस और वार्ता में भ्रष्टाचार को गाली दे फूले न समाते हैं.

धर्म,भाषा,जाति का उन्माद  हमें लाख तोड़ता रहे ,
भ्रष्टाचार कलमाडी,  रेड्डी ; राजा,  राडिया को जोड़ता है !!
या यूं कहें कि सत्ता के बाज़ार में
काला धन छाती ठोक के बोलता है ?

Zephyr एक बहुत संजीदा ब्लॉगर हैं और उन्होंने भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठाई है http://voteforindia.org/.
क्या आप उनका साथ देंगे ?

January 23, 2011

भोपाल .

कभी इस शहर के पेड़ इसकी सड़कों से इश्क किया करते थे.
झूम के उन्हें अपने सायों के आगोश में भरा करते थे .
हर सड़क पे  इक खुशगवार सा मंज़र रहता  था -
कभी  रंगों और खुशबू का और छाँव की फैलती बाहों का .

लेकिन अब हर गली-चौराहे पे ,लाशें बिछी हैं -
बूढ़े और जवान पेड़ों की ,सब औंधे मुंह पथराई आँख देखते हैं.
मैंने देखा- JCB राक्षश के पीले जबड़े ,बूढ़े बरगद की बेइंतहा जड़े कुरेद रहे थे.
ओर पुराने नीम के ढेर ,चिता की लकड़ी की तरह सजे थे ,सड़क किनारे.

अब यह शहर तरक्की कर रहा है,और तरक्की पेड़ों से नहीं,
अजगर जैसी जानलेवा सडकों से होती है -जिनके पेट कभी भरते नहीं.
अब तो खाक उड़ती है ,और गाड़ियाँ भी -पंछियों को परवाज़ मगर नसीब नहीं.
कोह-ए-फिजा और ईदगाह से हो कर जहन्नुम की सड़क गुज़रती है यहीं से कहीं.

रात को देखा , बुझते कोयले जैसा मद्धम चाँद टंगा था ,शर्मिंदा सा
इक सब्ज शाख भी न मिली जिसे , अपना खिलता रुख छिपाने को.

January 18, 2011

Food Porn.

Some light-hearted moments of deliciousness !
Guavas
One fat, yellow guava 
Rightly ripe : sits on my desk.
Aching to burst its sweetness
Into my hungering mouth.
Scented , pink-fleshed tempter ,
I savour every moment of you.
The best I ever had .
Oranges
I so love oranges.
The dimpled lush body
belying the piquant heart.  
The heady smell ,
so clean,yielding to
my eager fingers; juice
running down my chin .
Chocolat.
Take me for a walk
dear dark Chocolat .
When I see you , I can hardly think
Your aroma fills me -
Your bittersweet taste lingers.
Edgy and divine : like first love.

January 12, 2011

अहा ! तपिश .


कल कई दिन बाद सूरज खुल के मुस्कुराया
तो दिल गुन-गुनाया ,
ये ख्याल  आया-
यूं तो जमे हुए दिल भी धड़कते हैं,
पंछी धुंध में भी पर फड़कते हैं .,
फ़िर भी थोड़ी तपिश हर रोज़
life में कितनी ज़रूरी है .
उगने के लिए,
बढ़ने के लिए,
खिलने के लिए,
खिल-खिलाने  के लिए .
नहीं तो बेवजह लगता है कुछ कमी सी है
किसी से कोई शिकवा भी नहीं,पर मौसम में ग़मी सी है.

January 6, 2011

कोहरा.


पेड़ लगे हैं सोये-सोये
दूर ख्यालों में खोये-खोये.
हवा नम है - उजाले कम हैं.
एक झीनी चादर मलमल की-
थोड़ी भीगी-भीगी सी.
डली है हर ओर.
ओढ़ के झांकें
ओट से ताकें
बदल के रूप
छिपे -छिपाएं.
खेलें सौ-सौ खेल.
कभी बुत
कभी भूत
कभी बस धुआं-धुआं.
धुंध का गहरा कुआं.
मुंह छिपा कर ज्यों पूछें बच्चे
- बोल माँ-बूझ मैं कौन?
मैं कहाँ ?
-कोहरे में,
मौसम की मासूमियत-
दिलकश भी है,
दिलफरेब भी,
जानलेवा भी.

January 4, 2011

Winter Haikus.

A cup of hot tea
and some empathy
diffuse :  winter blues.
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Darjeeling
is appealing.
Assam-
Awesome.
Espresso 
less so.
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A toasty Tea
you will agree
is Bliss :
Green without caffeine
or a luscious Black
with a sugar and milk Jack.

December 27, 2010

Sometimes the Sun Shines Through.

The Dawn is a feeble old woman
Shuffling creakily.
The razor sharp winds rule.
Fog is her heavy mantle.
Grey  is the colour - the mood.
Suddenly an uproar of parrots
-A golden shimmer of a Hawk.
And a  blue jay a-glinting
On a gnarled and faded tree.
 A lone pansy nods its little head bravely.
All declare- the Dawn is lazy and slow too :
But the Sun will definitely Shine through.