Words can create magic and I want to get lost in them for some part of each day.

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August 2, 2012

बारिश के बाद .

रात भर बूँदें गिरती रही .
सुबह देखा तो :
नज़ारे सब नए थे .
पेड़ नहा के सब चमक गए थे।

थोडा झुक कर  
खुद को पानी में निहार रहा था 
नन्हा सजीला नींबू 

पीपल अपने हर पत्ते की नोक पर 
थामे था एक सुनहरी बूँद 
जैसे त्योहारी की तैयारी में  लड़ियाँ पिरो  रखी  हों .

और मालती की बेल 
यूं लहरा रही थी अपनी महकती लटें 
जैसे अभी-अभी shampoo कर 
अपने बाल झटक रही हो। 

June 28, 2012

दिल्ली के खँडहर।


दिल्ली के खामोश पुराने खँडहर देखे,
 तो इक भूला सा स्वाद याद आया...
तुमने अन्नानास की शराब पी है ?
बिलकुल इस शहर की तरह होती है -
जिसका कांटेदार, खुरदुरा, बदसूरत छिलका हटाने से 
रस मिलता है ,
मिठास भी ,
सदियों को उसमें जितना घोलो 
आता है उतना ही उम्दा स्वाद भी।

June 5, 2012

Delhi - II.


शोर मचाती सडकों  के किनारे खड़े खँडहर 
चुप-चाप क्या -क्या बोल जाते हैं। 
हँस  के कहते हैं -
चाहे कितनी सड़कें नाप लो 
सभी मकतल और मकबरों तक ही जाती हैं। 
बचता  कोई नहीं:
न सल्तनत न बादशाही ; न सोना ,न चांदी :
बस रह जाते है -
कुछ अनदेखे -कुछ अनबूझे ,बिखरे से पत्थर 
जिनपे नाम उकेरने को सभी बेताब रहते हैं 
पर जिनकी कहानी सुनने की अब फुर्सत किसे है ...

June 2, 2012

अमलतास .


मैंने देखा है 
अशर्फियों का पेड़ 
सोने के मुहरों के गुच्छे लटकते हैं 
ऐसे चमकता है कि -
सूरज भी कुछ देर शरमा  जाता  है 
और कहता है 
अच्छा , तुम जीते अमलतास -
मेरे सोने की आग तो झुलसाती भी है ,
पर तुम्हारा सोना तो दिल को तपन में भी ठंडक देता है :
अच्छा ,अब मानो  बात -
जाओ जाके कुछ पत्ते  पहन लो :)

May 14, 2012

The coils of Oil.

Navigating Oil 
is a tricky Business .
Like the Pakora ,
At right temperatures ,
You may puff up with self -importance 
And feel like a hot-shot for a while.
But a bit of squeezing or freezing 
and all you get is 
a blob of sad and soggy distasteful mess.
For thats what is left 
of the real you -
minus the oil .

April 18, 2012

नॉएडा .

कहते हैं यहाँ पैसा लगा के कोई नहीं पछताता है.
सौ गुना मुनाफा कमाता है.
जगह बड़ी पते की है .
ये और बात है कि -

अँधेरे खौफनाक हैं यहाँ के
पता नहीं कौन किसको 'rape ' कर
पान खाने , टहलने निकल चला हो .

रौशनी भी कुछ कम खतरनाक नहीं :
पता नहीं,किसने,कैसे ,किसको
गाडी तले कुचला और मुड़ के भी न देखा-

धुएं यहाँ ऐसे ज़हरीले
कि बस फेफड़े जकड लें -
'lungfill ' नहीं 'landfill ' है यहाँ .

वैसे  तो सब यहाँ बहुत अच्छा है
घर भी ,कार भी ,पैसा भी :

बिल्डिंगों  के  जंगल - 
गाड़ियाँ इतनी कि सड़क नज़र न आये ,
भीड़ इतनी कि इंसान गुम हो जाए ,
शोर इतना कि ख़ामोशी चुप रह जाए .

बहुत बढ़िया अस्पताल और स्कूल कालेज है यहाँ -
चाहे किसी रोग का इलाज खरीद लो .  
चाहे कैसी भी अक्ल हो -डिग्री और ठप्पा खरीद लो .
 समझदारी और सेहत का तो वैसे भी मार्केट down है.

यहाँ तो जी बड़ी रफ़्तार है ज़िन्दगी में - 
बस साँसों में Traffic Jam सा रहता है .

जब सुबह -शाम चींटी की सी कतारों में हम कारों के संग रेंगते हैं
तो कभी यूं ही कानों में अहमक तोतों वाले पीपल के पेड़ शोर मचाते हैं
तब न I -फ़ोन , न I -pad  में मुंह छुपा पाते हैं
बस किसी बेकार से शहर की बेकार सी बातें सोच के दिल बहलाते हैं.

वैसे पेड़ तो यहाँ भी हैं - बड़ी हिफाज़त से बचाए हैं
जैसे museum में पुरानी मूर्तियाँ सजा के रखते हैं.

एक  नदी भी शायद  जो कभी थी :
अब उसका बस प्रेत है
सुनते हैं उसके साथ जो हुआ..
किसी की माँ -बेटी के साथ न हो .
इसलिए सीने  में क़ाला विष भरे 
बेवा सी नज़र आती है.

पर malls में shopping  बहुत अच्छी है :
ऐसी कोई चीज़ नहीं जो यहाँ नहीं :फिर भी..

April 12, 2012

लोधी गार्डन .

लोधी गार्डन :

मेरी राहत -ए - जाँ ; मेरा सुकूत -ए- यास  है 
बेरुखी दिल्ली के दिल पर बिछी शबनमी घास है .

घने पेड़ ,पानी ,परिंदे ,फूल यहाँ खूब हैं 
जाने कांक्रिती जंगल में ये मंगल  कैसे महफूज़ है ?

ज़रूर कोई तिलिस्म होगा इन मकबरों और मज़ारों का -
या जादू होगा चुपचाप खड़ी पुरानी दीवारों का .

क्योंकि :

अक्सर इस शहर में ऐसी दीवारें कांच और सीमेंट तले दबी- छिपी दीखती हैं 
और हरियाली को गमलों में टांग दिया जाता है ,किसी momento की तरह .

कायम रहे यूं ही ये :

किसी हमदर्द की मेहेरबानी की तरह
सहरा में पानी की तरह 

खुदा के साथ की तरह 
दुआ के हाथ की तरह .

April 11, 2012

दिल्ली - I

कभी कभी लगता है की ये शहर इंसानों का नहीं:
गाड़ियों का शहर है

सर्र-सर्र , साँय -साँय दौड़ती
या भड- भडाती , धुआं उडाती गाड़ियाँ
हदे- निगाह  तक उमड़ती उलझती धूल उड़ाती गाड़ियाँ

कहीं रंग-बिरंगी बत्तियों और सायरनों तले बौखलाती इतराती गाड़ियाँ
कहीं  AC  के रूमानी सुकून में झूमती-झमझमाती गाड़ियाँ .
कहीं  भीड़ और गर्म हवा में बल -बलाती गाड़ियाँ  

यहाँ गाड़ियाँ सिर्फ गाड़ियाँ नहीं : पहचान हैं 
इस शहर के  बे-चेहरा लोगों के वजूद का निशान  

क्यों कि यहाँ  कोई किसी को नहीं पूछता
इसलिए सब अपनी औकात को काँधे पे  ढो कर चलते हैं
सोचते  है कि वोह  गाड़ी पे हैं : पाते हैं कि गाड़ी उनपे हैं

गाड़ियाँ :
भागते रहने पे मजबूर नस्ल का 
धोखे से भरा इत्मीनान है .. 

December 16, 2011

पुरानी दिल्ली .

On one of my frequent trips to Delhi ,I was staying close to Turkmaan Gate and decided to take a Rickshaw into the timeless bylanes behind it.It was early morning -the crowds were less enough for us to walk up to  Jama Masjid, discover Ghaalib's Haveli and a few of the grand Havelis of yore .Find gallis like galli Mem Waali , galli बूढी दाई waali and so on.The remains of the midnight flower bazaar could be seen and the business was brisk in the produce market -fruits ,veggies and meat for the Gourmet Hot Spots was being bought. There is nothing as quintessentially Indian and as quintessentially multicultural and secular as Chandni Chowk. Kasam se !!
हाय !
इक सुबह 
वो इत्तेफाकन मुलाक़ात
पुरानी दिल्ली से 
गोया किसी बुज़ुर्गा की झुर्रियों में 
झलकती जवानी देखना !
गुत्थी भी है ,पहेली भी है 
हंस कर कई राज़ ज़ाहिर करने वाली सहेली भी है.
आज के मुंह में पाँव फंसा कर खड़े बीते हुए कल की तस्वीर
और गली-कूचों में रुके हुए ज़मानों की तहज़ीब .
रिक्शे,ठेले ,बुर्के , लाले ,हलवाई :
फूलों के  बाज़ार ,कबूतरबाज़ , कसाई
धूप में ऊँघे बूढ़े ,बिल्ली और लाल ढाडी वाले मिर्ज़ा भाई .
वो ऊँची सीढियां जामा मस्जिद की ,वो कबूतरों से अटी मीनारें
जहाँ से पुरकशिश नज्ज़ारा  दीखता है इस तारीखी शहर का :
कभी जमुना यहीं पास थी और लाल किला  आबाद था.
वो अंधेरी गलियों में छिपी बड़ी हवेलियाँ
जहाँ शायद ग़ालिब की रूह अभी भी बसती  होगी
और  इस दौड़ती -भागती दुनियां की नादानी पे हँसती होगी.
पुरानी है : पर माशाल्लाह !  क्या गज़ब की रवानी है !!

October 17, 2011

मौसम के मिजाज़ .

अक्टूबर  का महीना 
कितने सधे हुए हैं मौसम के मिजाज़  :
धूप की तल्खियाँ  कुछ कम 
हवाओं के रुख भी नर्म 
कुछ ठंडक का अहसास है भी , और नहीं भी 
कुछ  गर्माहट की याद है भी  ,और नहीं भी
कुछ अगले मौसम के वादे
कुछ बीती रुत की बातें 
अभी सब नपी-तुली सी 
हैं भी पर नहीं भी.

August 10, 2011

कदमकुआं की कोठियाँ.

अब भी मालूम पड़ता है 
की बड़ी शानदार रही होंगी 
 ये कदमकुआं  की कोठियां 
वो लाल पत्थर के लम्बे बरामदे 
 वो हरे बांस की  जालियां
सफ़ेद खम्बों से लिपटी  चमेली 
Porch तक आते गोल  रास्ते
खड़ी होती होगी जहाँ एक गाड़ी
सामने एक सूखा  फव्वारा 
जो कभी इस उजड़े Lawn की शान होगा .

 कुछ इस शहर की तरह ही
 जिस के हर  गली चौक बाज़ार में 
 बिखरे हुए हैं जहीनों के नाम 
कहीं टूटा -फूटा दिनकर गोलंबर 
कहीं सच्चिदानंद सिन्हा लेन .
वीरान सी रामवृक्ष बेनीपुरी लायब्रेरी 
गड्ढों वाले  अज्ञेय और सांकृत्यायन मार्ग .
 कभी ये अज़ीम इस शहर में बसते थे.
गंगा किनारे बैठ के लिखते , गप-शप करते थे.
बेल और आम से सजी सड़कों पे शिरकत करते थे .

 अब तो बस गंगा है -
 कुछ कम बड़ी, कुछ ज़्यादा मैली .
और ये खंडहर होती हवेलियाँ .
इस अनेक गाँव वाले पुराने शहर के अतीत की  निशानियाँ .

August 9, 2011

Let us be Comfortable.

Rains Well  Up
Behind The Dark Clouds.
A pent-up Torpor reigns
Things Blocked,broken ,Held up
Rusty swings, Unending queues and Traffic Jams
Dams Of Sweat Break loose.
Sucking Energy
Faster than
Quicksand 
The Ripe Monsoon Air
Hangs like a Sigh .
A Desperation
That can not Cry.
Let us not Notice
And turn the Airconditioning High.

July 3, 2011

Balancing Books.

She measures well
all that is measurable
puts labels and amounts
on that which is not                                                                      
Counting in neat stacks 
Ticking off items 
Weighing all the stuff
Taking in before any Giving
Ounce for an ounce
Making the right Deductions
It is Excellent Management
All that toting -
And Balancing of Books.
The Neat Ledgers of Squared Deals.
But in her Accounts
All that is left on Credit
are Gripes and Regrets
Each debited neatly against
A small piece of her Peace Of Mind.

February 7, 2011

Oooh Eggs !


Fried Eggs
Fried eggs
With lacy brown edges
Somewhat tattered -
With a Sunshine heart
That oozes with cheesy,buttery
Warmth and Goodness.
Just an Egg. 
I am just an egg
I get addled,scrambled .
You can break my heart easily
Turn me to mush.
But when the heat is on:
I  can stand it with aplomb,
Know anyone who can
be cracked , coddled, but still remains whole :
without whom you can not start the day ?

December 15, 2010

मेरे दोस्त .

कुछ  दोस्त मेरे मुझे सैर पर  ले जाते हैं 
कभी खिड़की तो कभी चशमा बन 
बीते और आने वाले कल से  मुलाकात कराते हैं.
कभी गप्पें तो कभी किस्से सुनाते हैं.
अपनी हरकत से यूं ही हंसाते- बहलाते हैं.

कुछ दोस्त ज़रा संजीदा हैं.
वोह दिल की गहराई में उतर 
कुछ ऐसा  कह देते हैं 
जो मन ने जाना था यकीनन -पर बोलों पर आ न सका.
वोह दिल में कभी आह, तो कभी सिरहन जगाते हैं.   

कुछ मददगार हैं मेरे -
हर मुश्किल का हल बताते हैं.
अमल के रास्ते और रास्तों के पड़ाव सुझाते हैं.
मैं कहीं भी निकल जाऊं चाहे, इन दोस्तों का साथ 
रहता है मेरे साथ -साथ.

ये  दोस्त  मेरे सुख-दुःख के  साथी हैं.
चुप-चाप मेरे जीवन में गुनगुनाते  हैं.
कभी  बरकत की तरह,कभी रहमत की तरह ;
कभी वुज़ू की तरह,कभी आँचल की तरह -
ये  मुझ में उतर जाते हैं.

लोग कहते हैं, बस किताबें ही तो हैं.

November 13, 2010

वो कविता वाली.

कवितायेँ तो मेरे चारों तरफ़ हमेशा  थीं -
मानो लफ़्ज़ों के ढेर लगे थे.
पर मैं मीठे  के शौक़ीन बच्चे की तरह,
किस्से-कहानियों  की टॉफी चूसती रही.
ज़रूर कुछ हसीं जुमलों से  उलझती थी कभी-
पर यूं ही  किनारों से खेल कर वापस आती.
फ़िर वो मिली बेधड़क ,बेबाक -
हर चीज़ पे अपनी राय देने वाली .
इक पल में झिड़कती ,झगड़ती,
दूसरे में शेयर  कर  लेती हर कुछ .
जैसे सभी उसके दोस्त हों .
और उसकी कविता वाली झोली में तो इतने छेद  थे -
कि हर वक़्त दो-चार  टपक जातीं पके आम की तरह.
अरे बाबा मैंने भी पढ़े हैं बहुत Plath ,Neruda ,कोलातकर,विजयन , Whitman  वगैरह .
न जाने कितने नाम गिनाने , गिराने वाली.
पढ़े पर यूं दिल में उतारे नहीं-
और जो नाम के साथ गिर रहा था
वह तो एक जादू था -कभी ज़्यादा चलता कभी कम .
पर हौले-हौले कुछ तार जुड़ते गए,
निस्बत का असर करते गए .
कुछ मुलाकातें ज़हीनों   से
अक्सर कितनी ज़रूरी हैं.

October 27, 2010

Orchaa

गोल गुम्बद ,झरोखे जालीदार
तस्वीरों से सजे दरो-दीवार .
दीवारों में  बसी बीती कहानियाँ
घुंघरूओं की सदा ,रानियों की निशानियाँ .
कहीं मीनाकारी के नीले टुकड़े
कहीं शीशे से उकेरे फूल और पत्ते .
पुराने बागों के पिंजर
ऊंची सीढ़ियों के मंदिर 
बेतवा किनारे खड़े हैं ये  खंडहर ग़मगीन
यहाँ थिरकी थी कभी राय परवीन.
अब तो न जशन है, न रक्स  है
बस थमे हुए वक़्त का इक उम्दा अक्स है.

September 2, 2010

नटखट गुलाब .

लगा तो है पडोसी के घर पौधा
पर उसके दो नन्हे गुलाब
नटखट नादान बच्चों कि तरह
बाड़ में से मुंडी घुसेड़
झाँक रहे हैं
मेरे lawn में.

August 14, 2010

Udayagiri.


Clouds swim over Udayagiri
Mahua in bloom lazily leans
Lonely Cave Gods are anointed with flowers
Black Rocks are clad in Green.

Sanchi.


Down the hill of Sanchi
Steps lead to monks quarters
Kadamb and wild Henna scent the air
Green and still stand the ancient waters.

Lights are lit in the town below
As cows and herders head home
Old stones speak so eloquently-
Of timeless glory of days bygone.