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June 28, 2012
June 5, 2012
Delhi - II.
चुप-चाप क्या -क्या बोल जाते हैं।
हँस के कहते हैं -
चाहे कितनी सड़कें नाप लो
सभी मकतल और मकबरों तक ही जाती हैं।
बचता कोई नहीं:
न सल्तनत न बादशाही ; न सोना ,न चांदी :
बस रह जाते है -
कुछ अनदेखे -कुछ अनबूझे ,बिखरे से पत्थर
जिनपे नाम उकेरने को सभी बेताब रहते हैं
पर जिनकी कहानी सुनने की अब फुर्सत किसे है ...
April 18, 2012
नॉएडा .
कहते हैं यहाँ पैसा लगा के कोई नहीं पछताता है.
सौ गुना मुनाफा कमाता है.
जगह बड़ी पते की है .
ये और बात है कि -
अँधेरे खौफनाक हैं यहाँ के
पता नहीं कौन किसको 'rape ' कर
पान खाने , टहलने निकल चला हो .
रौशनी भी कुछ कम खतरनाक नहीं :
पता नहीं,किसने,कैसे ,किसको
गाडी तले कुचला और मुड़ के भी न देखा-
धुएं यहाँ ऐसे ज़हरीले
कि बस फेफड़े जकड लें -
'lungfill ' नहीं 'landfill ' है यहाँ .
वैसे तो सब यहाँ बहुत अच्छा है
घर भी ,कार भी ,पैसा भी :
बिल्डिंगों के जंगल -
भीड़ इतनी कि इंसान गुम हो जाए ,
शोर इतना कि ख़ामोशी चुप रह जाए .
बहुत बढ़िया अस्पताल और स्कूल कालेज है यहाँ -
चाहे किसी रोग का इलाज खरीद लो .
चाहे कैसी भी अक्ल हो -डिग्री और ठप्पा खरीद लो .
समझदारी और सेहत का तो वैसे भी मार्केट down है.
समझदारी और सेहत का तो वैसे भी मार्केट down है.
यहाँ तो जी बड़ी रफ़्तार है ज़िन्दगी में -
बस साँसों में Traffic Jam सा रहता है .
जब सुबह -शाम चींटी की सी कतारों में हम कारों के संग रेंगते हैं
तो कभी यूं ही कानों में अहमक तोतों वाले पीपल के पेड़ शोर मचाते हैं
तब न I -फ़ोन , न I -pad में मुंह छुपा पाते हैं
बस किसी बेकार से शहर की बेकार सी बातें सोच के दिल बहलाते हैं.
वैसे पेड़ तो यहाँ भी हैं - बड़ी हिफाज़त से बचाए हैं
जैसे museum में पुरानी मूर्तियाँ सजा के रखते हैं.
एक नदी भी शायद जो कभी थी :
अब उसका बस प्रेत है
सुनते हैं उसके साथ जो हुआ..
किसी की माँ -बेटी के साथ न हो .
इसलिए सीने में क़ाला विष भरे
बेवा सी नज़र आती है.
पर malls में shopping बहुत अच्छी है :
ऐसी कोई चीज़ नहीं जो यहाँ नहीं :फिर भी..
April 12, 2012
लोधी गार्डन .
लोधी गार्डन :
मेरी राहत -ए - जाँ ; मेरा सुकूत -ए- यास है
बेरुखी दिल्ली के दिल पर बिछी शबनमी घास है .
घने पेड़ ,पानी ,परिंदे ,फूल यहाँ खूब हैं
जाने कांक्रिती जंगल में ये मंगल कैसे महफूज़ है ?
ज़रूर कोई तिलिस्म होगा इन मकबरों और मज़ारों का -
या जादू होगा चुपचाप खड़ी पुरानी दीवारों का .
क्योंकि :
अक्सर इस शहर में ऐसी दीवारें कांच और सीमेंट तले दबी- छिपी दीखती हैं
और हरियाली को गमलों में टांग दिया जाता है ,किसी momento की तरह .
कायम रहे यूं ही ये :
किसी हमदर्द की मेहेरबानी की तरह
सहरा में पानी की तरह
सहरा में पानी की तरह
खुदा के साथ की तरह
दुआ के हाथ की तरह .
April 11, 2012
दिल्ली - I
कभी कभी लगता है की ये शहर इंसानों का नहीं:
गाड़ियों का शहर है
सर्र-सर्र , साँय -साँय दौड़ती
या भड- भडाती , धुआं उडाती गाड़ियाँ
हदे- निगाह तक उमड़ती उलझती धूल उड़ाती गाड़ियाँ
कहीं रंग-बिरंगी बत्तियों और सायरनों तले बौखलाती इतराती गाड़ियाँ
कहीं AC के रूमानी सुकून में झूमती-झमझमाती गाड़ियाँ .
कहीं भीड़ और गर्म हवा में बल -बलाती गाड़ियाँ
यहाँ गाड़ियाँ सिर्फ गाड़ियाँ नहीं : पहचान हैं
इस शहर के बे-चेहरा लोगों के वजूद का निशान
क्यों कि यहाँ कोई किसी को नहीं पूछता
इसलिए सब अपनी औकात को काँधे पे ढो कर चलते हैं
सोचते है कि वोह गाड़ी पे हैं : पाते हैं कि गाड़ी उनपे हैं गाड़ियाँ :
भागते रहने पे मजबूर नस्ल का
धोखे से भरा इत्मीनान है ..
December 16, 2011
पुरानी दिल्ली .
On one of my frequent trips to Delhi ,I was staying close to Turkmaan Gate and decided to take a Rickshaw into the timeless bylanes behind it.It was early morning -the crowds were less enough for us to walk up to Jama Masjid, discover Ghaalib's Haveli and a few of the grand Havelis of yore .Find gallis like galli Mem Waali , galli बूढी दाई waali and so on.The remains of the midnight flower bazaar could be seen and the business was brisk in the produce market -fruits ,veggies and meat for the Gourmet Hot Spots was being bought. There is nothing as quintessentially Indian and as quintessentially multicultural and secular as Chandni Chowk. Kasam se !!
हाय !
इक सुबह
वो इत्तेफाकन मुलाक़ात
पुरानी दिल्ली से
गोया किसी बुज़ुर्गा की झुर्रियों में
झलकती जवानी देखना !
गुत्थी भी है ,पहेली भी है
हंस कर कई राज़ ज़ाहिर करने वाली सहेली भी है.
आज के मुंह में पाँव फंसा कर खड़े बीते हुए कल की तस्वीर
और गली-कूचों में रुके हुए ज़मानों की तहज़ीब .
रिक्शे,ठेले ,बुर्के , लाले ,हलवाई :
फूलों के बाज़ार ,कबूतरबाज़ , कसाई
धूप में ऊँघे बूढ़े ,बिल्ली और लाल ढाडी वाले मिर्ज़ा भाई .
वो ऊँची सीढियां जामा मस्जिद की ,वो कबूतरों से अटी मीनारें
जहाँ से पुरकशिश नज्ज़ारा दीखता है इस तारीखी शहर का :
कभी जमुना यहीं पास थी और लाल किला आबाद था.
वो अंधेरी गलियों में छिपी बड़ी हवेलियाँ
जहाँ शायद ग़ालिब की रूह अभी भी बसती होगी
और इस दौड़ती -भागती दुनियां की नादानी पे हँसती होगी.
पुरानी है : पर माशाल्लाह ! क्या गज़ब की रवानी है !!
December 9, 2010
Advise.
दिल्ली की आबो-हवा में
ज़ोर-आज़माइश है
आप ने तो कभी आज़माई नहीं.
इशारों से समझाइश है .
हुनरों की नुमाइश है .
आपको करनी तो आयी नहीं.
आप तो अपने हिस्से के आसमान में
उड़ते रहे ,खुश होते रहे .
खिड़की पार की दुनिया पे नज़र टिकाई नहीं.
न बुरा मानिए ,गर दुनिया सोचे -
बेचारे ,बेवकूफ की कोई ख्वाहिश ही नहीं.
ज़ोर-आज़माइश है
आप ने तो कभी आज़माई नहीं.
इशारों से समझाइश है .
हुनरों की नुमाइश है .
आपको करनी तो आयी नहीं.
आप तो अपने हिस्से के आसमान में
उड़ते रहे ,खुश होते रहे .
खिड़की पार की दुनिया पे नज़र टिकाई नहीं.
न बुरा मानिए ,गर दुनिया सोचे -
बेचारे ,बेवकूफ की कोई ख्वाहिश ही नहीं.
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