Words can create magic and I want to get lost in them for some part of each day.

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June 26, 2011

मेरे घर की सड़क .


मेरे घर तक जाती थी 
पुराने पेड़ों से ढंकी इक सड़क 
दोनों ओर आती थी कभी अमराइयों से 
पकते  आमों की महक .
और दीखता था  कभी 
धानी चादर वाले खेतों में लहकता कनक.
हर बूढ़े पेड़ के नीचे थे 
लोगों के छोटे से बसेरे 
और मामूली सी चीज़ों की मामूली सी दुकान
फूल वाले,सब्जी वाले ,फल वाले -
पंचर भाग्य हो या साइकल उसे ठीक करने वाले   
तंग हो भी तो ,संग-दिल नहीं थी वो सड़क -
दोस्ताने भरे चेहरों की कड़ी थी वो सड़क 

पर अब ज़िन्दगी दोस्ताना नहीं रफ़्तार मांगती है 
साइकल और स्कूटर नहीं कार मांगती है 
हर वक़्त खरीदने के लिए बहुत सारा सामान मांगती है.
शायद इसीलिए हो गयी है मेरे घर की सड़क 
अब हो गयी है इक अनजान ,बेजान सी सड़क 
पेड़ों से,दोस्तों से , हमराहियों से वीरान सी सड़क.
है वो अब बहुत चौड़ी,आलीशान सी सड़क 
शीशे के महल-नुमा malls पे मेहरबान सी सड़क.

May 9, 2011

Eucalyptus Obnoxious.


The mozzies hate it,
The Ozzies love it.
But I get rather tight-lipped
When I see the silver-barked Eucalypt.

I detest the way its (non) branches sway in the breeze
An anti-tree - a blot on all trees.
No shade,no shelter,no fruit,no food.
Acid buds fall where mango and neem once stood.

It spites the soil on which it grows
Turning arid fields and meadows.
Water sucker, pernicious-
Revels in monoculture obnoxious.

It grows fast,It burns fast
It kills other flora ,but lasts and lasts.
I often think, the Eucalyptus -
Is an embodiment of some Botanical Grudge or Animus.

May 8, 2011

ख़ास खबर .

 बारिशों  में  सब्ज़ शाखों का मचलना ,
बसंत में शोख कलियों का चटकना,
बहुत दिलकश ज़रूर- पर कोई ख़ास खबर नहीं.
मगर अंगारों पे से गुजरी हुई इन गर्म हवाओं के आलम में 
सुर्ख गुलमोहर के फूलों का दहकना
साल-दर-साल मुझे  चौंकाता है.  
प्यासी धरती , सुलगते उफुक पर 
कुछ रंग-ओ-बहार छलकाता है.

March 24, 2011

जेठ की तैयारी .

देखो तैयारी  में हैं सब पेड़
जेठ के साथ ज़ोर-आज़माइश  की.
बेल,साल,नीम और पीपल 
अशोक,इमली और सेमल.
उतार रहे पुराने पत्तों के पैरहन 
अब नए सब्ज़ दोशाले ओढ़ कर 
सर-चढ़ी धूप के नश्तर तोड़कर 
झुरमुटी छाँव के घर बनायेंगे
हर पंछी और राहगीर को बुलाएँगे .
कितने दूरंदाज़ और खुद्दार हैं पेड़ !

March 15, 2011

घूमते जंगल .

बांधवगढ़ -ताला वन .
ये   दूर  तक  फैले बेतरतीब से जंगल 
कमाल लगते हैं करीब से जंगल .
जिनमे गदराये शीशम ,सुलगे पलाश 
गुत्थम-गुत्था घास ,उलझे-उलझे बांस .
बूढी लताएँ लपेटे ,तने-तने से साल -
सेमल,बीजा ,बेल;महुआ,बेर और आम .
बड़े पत्ते ,सूखे पत्ते, हरे-पीले -लाल पत्ते .
काले तने ,भूरे तने ,सफ़ेद चांदी वाले तने .
नरम,नए कोंपल  वाले ;अधपके से पतझड़ वाले.
बौर वाले ,फूल वाले ,खट्टे -मीठे फल वाले .
टेढ़े -मेड़े,झुके,लटके,एक दूसरे से सटे पेड़ .
गिरे पेड़,खड़े पेड़ ,पानियों में पड़े पेड़. 
डाल-झुरमुट-छाँव वाले पंछियों के गाँव वाले. 
जड़े जिनकी धरा पकडे, आसमा में ठांव  वाले.
पत्थरों में भी झूमते हैं - रास्तों संग घूमते हैं .
मैंने घूमा जंगल ,अब जंगल दिल में घूमते हैं.

January 23, 2011

भोपाल .

कभी इस शहर के पेड़ इसकी सड़कों से इश्क किया करते थे.
झूम के उन्हें अपने सायों के आगोश में भरा करते थे .
हर सड़क पे  इक खुशगवार सा मंज़र रहता  था -
कभी  रंगों और खुशबू का और छाँव की फैलती बाहों का .

लेकिन अब हर गली-चौराहे पे ,लाशें बिछी हैं -
बूढ़े और जवान पेड़ों की ,सब औंधे मुंह पथराई आँख देखते हैं.
मैंने देखा- JCB राक्षश के पीले जबड़े ,बूढ़े बरगद की बेइंतहा जड़े कुरेद रहे थे.
ओर पुराने नीम के ढेर ,चिता की लकड़ी की तरह सजे थे ,सड़क किनारे.

अब यह शहर तरक्की कर रहा है,और तरक्की पेड़ों से नहीं,
अजगर जैसी जानलेवा सडकों से होती है -जिनके पेट कभी भरते नहीं.
अब तो खाक उड़ती है ,और गाड़ियाँ भी -पंछियों को परवाज़ मगर नसीब नहीं.
कोह-ए-फिजा और ईदगाह से हो कर जहन्नुम की सड़क गुज़रती है यहीं से कहीं.

रात को देखा , बुझते कोयले जैसा मद्धम चाँद टंगा था ,शर्मिंदा सा
इक सब्ज शाख भी न मिली जिसे , अपना खिलता रुख छिपाने को.

May 14, 2010

Progressively Treeless!

 tree cut by the BRT employees at Bahadur Shah Zafar Marg in the Capital  — Tribune photo by Mukesh Aggarwal





When all the trees have died
in making all the roads wide
and buildings glitzy and bright
We will condition the air inside
But who will stop the dust tides?
And where will the birds hide?
Till when must we blindly ride,
to meet an Oxygen-less,arid suicide?