Words can create magic and I want to get lost in them for some part of each day.

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November 21, 2012

धूप .

धुआं -धुआं सा हट गया है
आज कोहरा छट गया है।

सफर था जो कंटीला, दुरूह
चलते-चलते कट गया है।

कुछ लिख के ,कह के,सुन के
दर्द बिखर या बँट गया है।

कुछ सह के ,कुछ नदी सम बह के -
गए अँधेरे  : सूरज फिर से डट गया है।  

May 8, 2012

पहिया .

कभी  कभी लगता है :
मैं  सिर्फ एक पहिया हूँ -

बस मील मापती  रहती  हूँ 
और धूल फाँकती  रहती हूँ 

हर मंज़िल मुझसे बेखबर 
है फिरना मुझ को दर-ब -दर 

उनींदी आँखें लिए जागती रहती हूँ 
बस पड़ाव ताकती रहती हूँ 

मेरे चलने से ही सब कुछ चलता है 
फिर भी , बस ठहराव की मोहलत मांगती रहती हूँ।