Words can create magic and I want to get lost in them for some part of each day.

June 2, 2012

अमलतास .


मैंने देखा है 
अशर्फियों का पेड़ 
सोने के मुहरों के गुच्छे लटकते हैं 
ऐसे चमकता है कि -
सूरज भी कुछ देर शरमा  जाता  है 
और कहता है 
अच्छा , तुम जीते अमलतास -
मेरे सोने की आग तो झुलसाती भी है ,
पर तुम्हारा सोना तो दिल को तपन में भी ठंडक देता है :
अच्छा ,अब मानो  बात -
जाओ जाके कुछ पत्ते  पहन लो :)

May 24, 2012

जी चाहता है ...

कई रोज़, किसी काले  बादल को खोल कर गटागट पीने को ,
या आसमान की नीली चादर ओढ़ कर सोने को जी चाहता है।

उपले ,बाड़े ,फूस ,खेत सूंघने का 
या गीली मिट्टी में खेलने -लोटने का जी चाहता है।

लक्ष्मी गाय ,मोती कुत्ता , मोटा बिल्ला सब पर प्यार जताने को ,
या बिन नाम की ढीठ ,शोर मचाती मुर्गियों पर झूठ -मूठ गुस्साने को जी चाहता है।

किसी ऊंचे  से टीले पर चढ़ कर बोल लगाने का -
जो छूट गया है - उसे वापस बुलाने का जी चाहता है।

आ तो गयी मैं सधे क़दमों से बहुत दूर  तक 
पर अचानक मुड़ कर दौड़ जाने का जी चाहता है।

जानती हूँ , कि जिस गोबर लिपे  आँगन में  मैंने 
इत्मीनान की  चारपाई  बिछाई थी :

वह अब बस सपना है -
फिर भी जाने ये दिल क्या -क्या चाहता  है।

May 14, 2012

The coils of Oil.

Navigating Oil 
is a tricky Business .
Like the Pakora ,
At right temperatures ,
You may puff up with self -importance 
And feel like a hot-shot for a while.
But a bit of squeezing or freezing 
and all you get is 
a blob of sad and soggy distasteful mess.
For thats what is left 
of the real you -
minus the oil .

May 8, 2012

पहिया .

कभी  कभी लगता है :
मैं  सिर्फ एक पहिया हूँ -

बस मील मापती  रहती  हूँ 
और धूल फाँकती  रहती हूँ 

हर मंज़िल मुझसे बेखबर 
है फिरना मुझ को दर-ब -दर 

उनींदी आँखें लिए जागती रहती हूँ 
बस पड़ाव ताकती रहती हूँ 

मेरे चलने से ही सब कुछ चलता है 
फिर भी , बस ठहराव की मोहलत मांगती रहती हूँ।

May 2, 2012

Friends and Relations.

न दोस्तों में करते हैं ,न दुश्मनों में करते हैं 
उनकी गिनती अब हम बर्फ़ाब अना की पथराई हुई लकीरों में करते हैं।

***
माना की अक्सर दोस्ती के लिबास में अगियार मिले
मगर रहजन इत्तेफाक़न कई दिलदार मिले।
कभी दो मिले ,कभी चार मिले -
भीड़ में कुछ तो अपने यार मिले। 
***

April 18, 2012

नॉएडा .

कहते हैं यहाँ पैसा लगा के कोई नहीं पछताता है.
सौ गुना मुनाफा कमाता है.
जगह बड़ी पते की है .
ये और बात है कि -

अँधेरे खौफनाक हैं यहाँ के
पता नहीं कौन किसको 'rape ' कर
पान खाने , टहलने निकल चला हो .

रौशनी भी कुछ कम खतरनाक नहीं :
पता नहीं,किसने,कैसे ,किसको
गाडी तले कुचला और मुड़ के भी न देखा-

धुएं यहाँ ऐसे ज़हरीले
कि बस फेफड़े जकड लें -
'lungfill ' नहीं 'landfill ' है यहाँ .

वैसे  तो सब यहाँ बहुत अच्छा है
घर भी ,कार भी ,पैसा भी :

बिल्डिंगों  के  जंगल - 
गाड़ियाँ इतनी कि सड़क नज़र न आये ,
भीड़ इतनी कि इंसान गुम हो जाए ,
शोर इतना कि ख़ामोशी चुप रह जाए .

बहुत बढ़िया अस्पताल और स्कूल कालेज है यहाँ -
चाहे किसी रोग का इलाज खरीद लो .  
चाहे कैसी भी अक्ल हो -डिग्री और ठप्पा खरीद लो .
 समझदारी और सेहत का तो वैसे भी मार्केट down है.

यहाँ तो जी बड़ी रफ़्तार है ज़िन्दगी में - 
बस साँसों में Traffic Jam सा रहता है .

जब सुबह -शाम चींटी की सी कतारों में हम कारों के संग रेंगते हैं
तो कभी यूं ही कानों में अहमक तोतों वाले पीपल के पेड़ शोर मचाते हैं
तब न I -फ़ोन , न I -pad  में मुंह छुपा पाते हैं
बस किसी बेकार से शहर की बेकार सी बातें सोच के दिल बहलाते हैं.

वैसे पेड़ तो यहाँ भी हैं - बड़ी हिफाज़त से बचाए हैं
जैसे museum में पुरानी मूर्तियाँ सजा के रखते हैं.

एक  नदी भी शायद  जो कभी थी :
अब उसका बस प्रेत है
सुनते हैं उसके साथ जो हुआ..
किसी की माँ -बेटी के साथ न हो .
इसलिए सीने  में क़ाला विष भरे 
बेवा सी नज़र आती है.

पर malls में shopping  बहुत अच्छी है :
ऐसी कोई चीज़ नहीं जो यहाँ नहीं :फिर भी..

April 12, 2012

लोधी गार्डन .

लोधी गार्डन :

मेरी राहत -ए - जाँ ; मेरा सुकूत -ए- यास  है 
बेरुखी दिल्ली के दिल पर बिछी शबनमी घास है .

घने पेड़ ,पानी ,परिंदे ,फूल यहाँ खूब हैं 
जाने कांक्रिती जंगल में ये मंगल  कैसे महफूज़ है ?

ज़रूर कोई तिलिस्म होगा इन मकबरों और मज़ारों का -
या जादू होगा चुपचाप खड़ी पुरानी दीवारों का .

क्योंकि :

अक्सर इस शहर में ऐसी दीवारें कांच और सीमेंट तले दबी- छिपी दीखती हैं 
और हरियाली को गमलों में टांग दिया जाता है ,किसी momento की तरह .

कायम रहे यूं ही ये :

किसी हमदर्द की मेहेरबानी की तरह
सहरा में पानी की तरह 

खुदा के साथ की तरह 
दुआ के हाथ की तरह .

April 11, 2012

दिल्ली - I

कभी कभी लगता है की ये शहर इंसानों का नहीं:
गाड़ियों का शहर है

सर्र-सर्र , साँय -साँय दौड़ती
या भड- भडाती , धुआं उडाती गाड़ियाँ
हदे- निगाह  तक उमड़ती उलझती धूल उड़ाती गाड़ियाँ

कहीं रंग-बिरंगी बत्तियों और सायरनों तले बौखलाती इतराती गाड़ियाँ
कहीं  AC  के रूमानी सुकून में झूमती-झमझमाती गाड़ियाँ .
कहीं  भीड़ और गर्म हवा में बल -बलाती गाड़ियाँ  

यहाँ गाड़ियाँ सिर्फ गाड़ियाँ नहीं : पहचान हैं 
इस शहर के  बे-चेहरा लोगों के वजूद का निशान  

क्यों कि यहाँ  कोई किसी को नहीं पूछता
इसलिए सब अपनी औकात को काँधे पे  ढो कर चलते हैं
सोचते  है कि वोह  गाड़ी पे हैं : पाते हैं कि गाड़ी उनपे हैं

गाड़ियाँ :
भागते रहने पे मजबूर नस्ल का 
धोखे से भरा इत्मीनान है .. 

December 25, 2011

Living Up and Counting Down !

Ah the Countdown has begun !
To the celebratory  Paroxysms of  Fun...

Christmas followed by New Year 
There will be Excess of Food ,Wine and Good Cheer 

A whirl of eating ,buying ,meeting 
Gifting , merry- X-masing and New Year Greeting :)

Scrambling to cross the line of 2011 
In glitzy malls and shiny Consumer Heavens.

Tinsel trinkets will glow and glitter 
And next day forlornly lie in litter.

Cakes,cookies , Chocolates will Dissolve 
Jeeringly your Pious Resolves .

A Drink or *few* will add to Confusion
Bury the last year : lets have another New Year, one more Resolution :))

December 16, 2011

पुरानी दिल्ली .

On one of my frequent trips to Delhi ,I was staying close to Turkmaan Gate and decided to take a Rickshaw into the timeless bylanes behind it.It was early morning -the crowds were less enough for us to walk up to  Jama Masjid, discover Ghaalib's Haveli and a few of the grand Havelis of yore .Find gallis like galli Mem Waali , galli बूढी दाई waali and so on.The remains of the midnight flower bazaar could be seen and the business was brisk in the produce market -fruits ,veggies and meat for the Gourmet Hot Spots was being bought. There is nothing as quintessentially Indian and as quintessentially multicultural and secular as Chandni Chowk. Kasam se !!
हाय !
इक सुबह 
वो इत्तेफाकन मुलाक़ात
पुरानी दिल्ली से 
गोया किसी बुज़ुर्गा की झुर्रियों में 
झलकती जवानी देखना !
गुत्थी भी है ,पहेली भी है 
हंस कर कई राज़ ज़ाहिर करने वाली सहेली भी है.
आज के मुंह में पाँव फंसा कर खड़े बीते हुए कल की तस्वीर
और गली-कूचों में रुके हुए ज़मानों की तहज़ीब .
रिक्शे,ठेले ,बुर्के , लाले ,हलवाई :
फूलों के  बाज़ार ,कबूतरबाज़ , कसाई
धूप में ऊँघे बूढ़े ,बिल्ली और लाल ढाडी वाले मिर्ज़ा भाई .
वो ऊँची सीढियां जामा मस्जिद की ,वो कबूतरों से अटी मीनारें
जहाँ से पुरकशिश नज्ज़ारा  दीखता है इस तारीखी शहर का :
कभी जमुना यहीं पास थी और लाल किला  आबाद था.
वो अंधेरी गलियों में छिपी बड़ी हवेलियाँ
जहाँ शायद ग़ालिब की रूह अभी भी बसती  होगी
और  इस दौड़ती -भागती दुनियां की नादानी पे हँसती होगी.
पुरानी है : पर माशाल्लाह !  क्या गज़ब की रवानी है !!