न दोस्तों में करते हैं ,न दुश्मनों में करते हैंउनकी गिनती अब हम बर्फ़ाब अना की पथराई हुई लकीरों में करते हैं।
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माना की अक्सर दोस्ती के लिबास में अगियार मिले
मगर रहजन इत्तेफाक़न कई दिलदार मिले।
कभी दो मिले ,कभी चार मिले -
भीड़ में कुछ तो अपने यार मिले।
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