Words can create magic and I want to get lost in them for some part of each day.

July 18, 2010

उफ़!ये बेसुरे पंछी...

अल्ल-सुबह मेरी खिड़की के बाहर शुरू हो गया है शोर-गुल.
काना-फूसी करते बुड्ढों की तरह कई कबूतर मुंडेर पर जमा हैं .
और बतिया रहें हैं आपस में-
उन दो नौजवां गौरियों  के बारे जो दो चोंच हो,
चीखते हुए सुलझा रहें हैं कुछ ज़र और ज़ोरू के मसले .
बद-मिजाज़ मैनाएँ शायद पानी आने के इंतज़ार  में,
कर रहीं हैं नल पर खड़ी तू-तू  मैं-मैं .
मोर खफ़ा हैं  खटपटइए  की आवाजों से,
और मेओ मेओ  से तल्खी का इज़हार  कर रहें हैं .
कोयल फ़िर लड़ रही है अपने शौहर से
लगातार ऊंची आवाज़ में.
नामाकूल तोते इस माहौल में टें-टें 
की तान लगा कर रहें हैं सबकी हौसला-अफज़ाई.
और डर भी रहें हैं-
काँव-कांव की गश्त लगाते दरोगा कव्वों  से.
सच कितने बेसुरे हैं ये पंछी!
तुम्हारे FM की चमकीली, भड़कीली, रेशमी धुनों के सामने.
लेकिन फ़िर भी न जाने क्यों सुहाते हैं .