चुप-चाप क्या -क्या बोल जाते हैं।
हँस के कहते हैं -
चाहे कितनी सड़कें नाप लो
सभी मकतल और मकबरों तक ही जाती हैं।
बचता कोई नहीं:
न सल्तनत न बादशाही ; न सोना ,न चांदी :
बस रह जाते है -
कुछ अनदेखे -कुछ अनबूझे ,बिखरे से पत्थर
जिनपे नाम उकेरने को सभी बेताब रहते हैं
पर जिनकी कहानी सुनने की अब फुर्सत किसे है ...