लोधी गार्डन :
मेरी राहत -ए - जाँ ; मेरा सुकूत -ए- यास है
बेरुखी दिल्ली के दिल पर बिछी शबनमी घास है .
घने पेड़ ,पानी ,परिंदे ,फूल यहाँ खूब हैं
जाने कांक्रिती जंगल में ये मंगल कैसे महफूज़ है ?
ज़रूर कोई तिलिस्म होगा इन मकबरों और मज़ारों का -
या जादू होगा चुपचाप खड़ी पुरानी दीवारों का .
क्योंकि :
अक्सर इस शहर में ऐसी दीवारें कांच और सीमेंट तले दबी- छिपी दीखती हैं
और हरियाली को गमलों में टांग दिया जाता है ,किसी momento की तरह .
कायम रहे यूं ही ये :
किसी हमदर्द की मेहेरबानी की तरह
सहरा में पानी की तरह
सहरा में पानी की तरह
खुदा के साथ की तरह
दुआ के हाथ की तरह .